Tuesday, December 6, 2011

kavitaye-1

आँखें

जब तुम कंधे से लगकर
मेरी बांह को ज़ोर से भींचे
चल रही थी, मेरे साथ।
तब तक मेरे लिए
पूरा जीवन
समाप्त हो चुका था।
तब मुझे आकाश गंगा के
विश्वास और आस्था की दृढ़ता का
प्रथम दर्शन हुआ था,
तुम्हारी आँखें में।


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सुनो मित्र


मैं उस दिन बहुत उदास था
और आत्महत्या के बारे में सोच रहा था,
मानसिक रुप से मैंने सब से विदाई ले ली थी,
जब पहली बार तुम आये थे
मेरे मोबाइल पर, जिसे तब मैं आफ ही करने वाला था।
तुम्हारी आवाज में उत्साह था छः वर्ष बाद मेरे पोस्ट कार्ड को पुनः पढ़ने का
और खेद भी कि तुम्हारे आलसी स्वभाव से पत्रोत्तर में विलंब हुआ।
मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था....
न तुम्हारा उत्साह और न ही खेद ।
मुझे नहीं था याद कुछ भी, न तुम्हारा नाम ना अपना कार्ड।
मगर तुमने किसी प्रारब्ध की बात की थी
इतने वर्षें बाद ....
और मैं हैरान था, आत्मत्या भी कही स्थगित होती है!

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सुनो मित्र

मैं उस दिन बहुत उदास था
जब पहली बार तुम आये थे
किसी प्रारब्ध होने की बात की
तुमने इतने वर्षों बाद.....
और हम दोनों हैरान रह गये थे।

मैं उस दिन बहुत खुश था
जब पहली बार तुम मिले थे
डेढ़ हजार किलो मीटर की यात्रा के बाद
और हम दोनों हैरान रह गये थे
कि सच में हम मिले हैं।
मैं जान गया था तुम्हारे मन की उस विशेष प्रार्थना को
जो तुमने हौले से की थी
और दुनियां भर का सुख मांगा था मेरे लिए
....मैं हैरान रह गया था,
इक्कीसवीं सदी में भी कोई किसी के लिए प्रार्थना कर सकता है....?

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आंसू

गीले-गीले, गोल-गोल
दुख सबके खुद में समेटे।
बरसाती पहाड़ी नदी से बहुत तेज कभी-कभी,
तो कभी हिमपात के फहों से हौले से ढलक आते हैं
चिकने गालों पर
और कभी खो जाते हैं उलझी दाढ़ी में।
हर बार ही ले जाते हैं अपने साथ,
समेटे अपने गीलेपन में
ढेर-सा दर्द और यादें-वादे।
आंसू मोटे हों या छोटे
हर बार ही बड़ा होता है रोने वाले का दुख-दर्द।
आंसू थोड़े हो या ज्यादा,
उतनी जल्द नहीं शांत होतीं, रोती आंखें।
अक्सर दुबले-पतले, छोटे और कमजोर नहीं मिलते आंसू!
कभी-कभी होते हैं, आंसू खुशी के भी।
लेकिन इतने कम होते हैं
कि नहीं होता, उनके नाम पर आंसुओं का नाम!

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खुशी


कभी हौले से और कभी अचानक ही तेजी से
दौड़ आती है, होंठों पर
मस्तिष्क में उभरे भावों के तंत्रिका तंत्र द्वारा
विद्युत आयनों के रूप मं फैलने के बाद,
बहने लगती है फिर आंखों के रस्ते
अपनी तेज चमक बिखेरते, खुशी।
कभी-कभी अंगुलियों की राह
चुनरी-पल्लु के किनारे तक भी
उतर जाती है वो,
जहाँ सहमती है, ठिठकती है।
शायद शर्माती और डर भी जाती है कभी-कभी।
लेकिन नहीं हटती कभी भी पीछे,
इक बार जब आ जाती है।
कभी बड़ा ज़ोर लगाने पर और कभी अनायास ही
आ जाती है, करते हुए हमारी तलाश।
...जब कभी खो जाती है, लंबे समय के लिए
तब भी उसकी उम्मीद और चाह बनी रहती है।
और उगते सूर्य, बहती नदी, नीले आकाश, हरे-भरे वनों
महकते फूलों और चमकती चाँदनी को देख कर
जीवन के इस छोर से उस छोर तक बना रहता है विश्वास
हंसी के बने रहने का।
और बनी रहती है उसके भी बाद,
हर एक जीवन की।
इक याद बन कर हंसी!


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